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रविवार, 15 अप्रैल 2012

ईलाज संभव मधुमेह का...

छत्तीसगढ़ के छात्र ने खोजा डायबिटीज का देसी इलाज
रायपुर डेयरी टेक्नोलॉजी कॉलेज के एक छात्र ने मधुमेह के इलाज में बड़ी सफलता हासिल की है। गौमूत्र चूर्ण से मधुमेह ठीक करने के दावे को चूहों पर आजमाया गया तो नतीजे उत्साहित करने वाले थे। गोमूत्र और दूध चूर्ण के मिश्रण से कैप्सूल तैयार किया गया है। इसका पेटेंट मिलते ही बाजार में दवा आ जाएगी। 
गौमूत्र चूर्ण से मधुमेह ठीक करने की पहल करते हुए रायपुर डेयरी टेक्नोलॉजी कॉलेज के शोधार्थी यशवंत अटभैया को रिसर्च में सकारात्मक परिणाम मिले हैं। वे डेढ़ साल से इस पर शोध कर रहे थे। उन्होंने चूहों पर रिसर्च कर साबित किया है कि इससे मधुमेह से पूरी तरह मुक्ति पाई जा सकती है।
शोध में सबसे पहले 42 चूहों को स्टेपटो जोटासिन नामक केमिकल देकर डायबिटिज से पीड़ित किया गया। चूहों को सीरिंज के माध्यम से केमिकल दिया गया। इस दौरान ध्यान रखा गया कि चूहों के मुंह या गले में चोट न लगे। इस केमिकल के असर से चूहों में मधुमेह का असर 600 mg-dl तक पहुंच गया। 
इसके बाद 40 चूहों को गौमूत्र चूर्ण दिया गया तो मधुमेह का स्तर 140 mg-dl तक नीचे आ गया। वहीं दो चूहों को इसलिए गौमूत्र नहीं दिया गया ताकि परिणाम देखा जा सके। इन दोनों चूहों की ग्लाई सिनिया की वजह से मौत हो गई। रिसर्च में यह भी सामने आया कि अगर कोई मरीज 15 दिन तक इसका सेवन करता है तो डायबिटिज कम होता ही है साथ ही पूरी तरह समाप्त भी हो जाता है। 


100, 250 और 500 एमजी के कैप्सूल
रिसर्च में 100, 250 और 500 एमजी के कैप्सूल तैयार किए गए हैं। इसमें स्टीमड मिल्क पाउडर 75 प्रतिशत तो 25 प्रतिशत गौमूत्र पाउडर डाला जाता है। रिसर्च के मेजर एडवाइजर डॉ. पीएल चौधरी के अनुसार वे इसका पेटेंट करवाएंगे ताकि कोई दूसरा इस पर दावा न करे।
साइट इफैक्ट नहीं है
हम काफी दिनों से इस शोध में लगे हुए थे। इसका लाभ मधुमेह मरीजों को मिल सकेगा। गौमूत्र से बने कैप्सूल से कोई साइट इफैक्ट नहीं है। बड़े पैमाने पर रिसर्च करने से और बेहतर परिणाम आएगा। 
डॉ. पीएल चौधरी, मेजर एडवाइजर एवं ओ.एस.डी., कामधेनु विश्वविद्यालय

मधुमेह ठीक हो जाता है
चूहों पर परीक्षण के बाद हमें जो सफलता मिली है, उससे हम काफी उत्साहित हैं। इसका पेटेंट करवाने के लिए प्रक्रिया शुरू करेंगे। रिसर्च में जो बात सामने आई है उसके मुताबिक 15 दिन में भी गौमूत्र से मधुमेह ठीक हो जाता है। 
यशवंत अटभैया, शोधार्थी, डेयरी टेक्नोलाजी कॉलेज, रायपुर

जर्मनी से मंगवाना पड़ा केमिकल
स्टेपटो जोटासिन रायपुर में नहीं मिलने पर दिल्ली संपर्क किया गया। वहां भी नहीं मिला तो जर्मनी से मंगवाया गया। डेयरी टेक्नोलॉजी कॉलेज में रिसर्च के लिए उपयुक्त लैब नहीं होने पर एक निजी फार्मेसी कॉलेज के लैब में दो महीने तक चूहों पर परीक्षण किया गया।
चूर्ण बनाने के लिए मशक्कत
गौमूत्र को सुखाने पर चूर्ण नहीं बनता है। ऐसे में इसे वैक्यूम ड्राय तकनीक से सूखाया गया। एक लीटर मूत्र में दस ग्राम चूर्ण निकलने के बाद इससे कैप्सूल बनाने का रास्ता साफ हो गया। गौमूत्र में पाए जाने वाले इपिथिलियम ग्रोथ फैक्टर चूर्ण से सूखने के बाद भी गायब नहीं हुए। इसके बाद स्टीम्ड मिल्क पाउडर (इस दूध पाउडर में वसा नहीं होता) को गौमूत्र चूर्ण में मिश्रित कर सेल्यूलोस में भरकर कैप्सूल तैयार किया जाता है।


सौजन्य:- दैनिक भास्कर