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मेरी रचनाएं...

मेरे राजदार समर्थक मित्र बनने का शुक्रिया


रविवार, 4 सितंबर 2011

०५ सितम्बर शिक्षक दिवस एवं १४ सितम्बर हिंदी दिवस विशेष......

हिंदी महिमा.....

हिंदी हिन्दुस्तानी, हिंद की ये भाषा 
इस हिंदी में छिपी हुई है, उन्नति की परिभाषा 
भारत माता की उर माला का, मध्य पुष्प है हिंदी 
माता के मस्तक पर, जैसे शोभित हो बिंदी 
यह भरती गागर में सागर, लिखता जग देख ठगा सा 
!! हिंदी ....................................... परिभाषा !!
इस हिंदी में महाकाव्य रच तुलसी हुए महान 
अर्थ गंभीर ललित श्रृंगारिक, सब करते गुणगान 
नीराजन यह भूमि भारत का, जन-जन की है यह आशा 
!! हिंदी ....................................... परिभाषा !!
अपनी संस्कृति अपनी मर्यादा, अपनी भाषा का ज्ञान 
यही एक पाथेय हमारा, रहे सदा यह ध्यान 
बिन इसके यदि बढ़ा कदम, हम बनेंगे जग में तमाशा 
!! हिंदी ....................................... परिभाषा !!
अपनी भाषा की समर्थता से, हम सामर्थ्य बढ़ाये 
प्रगति वास्तविक है तब ही, जब सब हिंदी अपनाएं 
भारत का उत्थान है हिंदी, अमृत निर्झर झरता सा 
!! हिंदी ....................................... परिभाषा !!
अपने घर में अपनी भाषा हिंदी अपमानित न होवें 
वह है अभागा अमृत पाकर कालजयी जो ना होवें 
हिंदी सेवा में जुटकर साथी, अब झटके दूर हताशा 
!! हिंदी ....................................... परिभाषा !!
हिंदी पर गर्व करेंगे जब हम, देश महान बनेगा 
दिग दिगंत में व्यापित हिंदी नवल वितान बनेगा 
भारत का मान बढेगा ऐसा, होगा अम्बर झुका-झुका सा 
!! हिंदी ....................................... परिभाषा !!

आप सबको ०५ सितम्बर शिक्षक दिवस एवं
१४ सितम्बर हिंदी दिवस की अग्रिम 
ढेर सारी शुभकामनाएं !!!!

नीलकमल वैष्णव"अनिश"

गुरुवार, 1 सितंबर 2011

इंतज़ार........


शब्द को सुन  कर ही 
लगता है लम्बा समय है 
अगर कोई किसी को इंतज़ार 
करने के लिए कहता है तो फिर 
पूछिये मत क्योंकि सभी को
मालुम है कि इंतजार की घड़ी 
कितनी लम्बी होती है ?
हर एक पल एक सदी के समान गुजरता है 
और मैंने भी तो काफी इंतज़ार किया है, 
इंतज़ार...
इस शब्द का अर्थ मुझसे 
अच्छा और कौन बता सकता है 
क्योंकि मैंने पूरी जिंदगी 
सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा 
इंतजार ही तो किया है 
पर पता नहीं यह मौत 
आजतक आई क्यों नहीं........???

नीलकमल वैष्णव"अनिश"

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

कोरे सपने.......



बिना तुम्हारे बंजर होगा आसमान 
उजड़ी सी होगी सारी जमीन 
फिर उसी धधकते हुए सूर्य के प्रखर तले 
सब ओर चिलचिलाती काली चट्टानों पर 
ठोकर खाता, टकराता भटकेगा समीर 
भौंहों पर धुल-पसीना ले तन-मन हारा 
बेचैन रहूंगा फिरता मैं मारा-मारा
देखता रहूँगा क्षितिजों की 
सब तरफ गोल कोरी लकीर 
फिर भी सूनेपन की आईने में  चमकेगा लगातार 
मेरी आँखों में रमे हुए मीठे आकारों का निखर 
मैं संभल न पाऊंगा डालूँगा दृष्टि जिधर 
अपना आँचल फैलायेगी वह सहज उधर.......
नीलकमल वैष्णव"अनिश"
०९६३०३०३०१०
०९६३०३०३०१७

बुधवार, 17 अगस्त 2011

ज्ञान की कुंजी......

ज्ञान की कुंजी  
बिना किराये का मकान  - जेल  

सुबह की घड़ी               - मुर्गा

कलयुग का अमृत         - चाय 

कलयुग का देवता         - चोर 

आज की स्टाइल          - बाब कट 

आज की फिल्म           - मार-धाड़ 

खेत का राजा              - किसान 

हमारे स्कूल का सेन्टर  - बैरान 

चारा घोटाले का नायक - लालू प्रसाद यादव 

आज का गुंडा             - पुलिस 

घोटाले का राजा          - नरसिंह राव 

कापियों में सबसे आगे - रफ कापी 

इज्जतदार आदमी      - माफिया डान 

मार-धाड़ करने में सबसे आगे - स्कूली विद्यार्थी

सेर सुनने में मजा आता है, सेर सुनाने में मजा आता है 
अगर हो शेर सामने तो फिर... भागने में मजा आता है !!!
हा हा हा हा हा हा हा..... 
दोस्तों आज के लिए इतना ही बाकी
किसी और दिन सुनायेंगे अब अपने 
इस ब्लागर मित्र को विदा दीजिये नमस्कार...


नीलकमल वैष्णव "अनिश"
http://neelkamalkosir.blogspot.com
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सोमवार, 15 अगस्त 2011

15 अगस्त....


आप सभी मित्रों को स्वतंत्रता की ६५ वीं सालगिरह 
के इस पावन अवसर की अनेकानेक बधाईयाँ
आज हमारे देश को आजाद हुए ६५ वर्ष हो गए,
पर क्या हम सचमुच सम्पूर्ण रूप से
आजाद हैं ? 

क्या यह वही भारत है जिसका सपना हमारे 
वीर सपूतों ने अपनी प्राणों की बलिदान 
देकर देखी थी ?

पहले हम अंग्रेजों के गुलाम थे पर आज  हम
महंगाई, भ्रष्ट नेताओं और अफसरों के
गुलाम है,


महंगाई इस कदर हमें घेर चुकी 
है जहाँ से निकालने का कोई राह दिखाई
नहीं पड़ रही है
इस महंगाई रुपी डायन का अत्याचार 
इस कदर है कि इसकी मार सभी 
वस्तुओं पर देखी जा सकती है इसकी
असर को
खैर मैंने तो आप लोगों को स्वतंत्रता दिवस 
कि बधाई देने के लिए लिखना शुरू किया 
था पर मैं भटक कर कहाँ जा रहा हूँ इस
महंगाई के फेर में ........

पर एक बात जरुर बोलूंगा कि मुझे तो पता
है की मैं भटक कर कहाँ जा रहा था पर...
क्या किसी को पता है की यह देश की 
महंगाई कहाँ और किस ओर जा रही है ???
नीलकमल वैष्णव"अनिश"
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